सोमवार 24 अगस्त 2026 - 07:31
भावनाओं से नहीं, समझदारी से दुश्मन की साज़िश को नाकाम बनाएं: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी

लखनऊ, भारत के हुसैनाबाद स्थित लंगरख़ाना में पिछले वर्षों की तरह इस वर्ष भी 9 रबीउल अव्वल को ईद-ए-ज़हरा (स) का जश्न बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत पवित्र क़ुरआन की तिलावत से हुई। इसके बाद मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी ने महफ़िल-ए-फ़ज़ाइल को संबोधित किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मौलाना सैयद अली हाशिम आबिदी ने इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की इस हदीस को अपने भाषण का आधार बनाया:

"दीन की पूर्णता हमारी विलायत और हमारे दुशमनो से बराअत मे है।"

उन्होंने कहा कि तवल्ला और तबर्रा का संबंध इंसान की प्रकृति और अंतरात्मा से है। इंसान जिससे प्रेम और मोहब्बत करता है, उसके दुश्मनों से दूरी और बेगानगी भी अपनाता है।

ला इलाहा इल्लल्लाह का अर्थ

मौलाना ने "ला इलाहा इल्लल्लाह" की व्याख्या करते हुए कहा कि यह ऐसा कलमा है, जिसके इकरार से इंसान केवल बाहरी रूप से ही नहीं, बल्कि अंदर से भी पवित्र होता है। इस कलमे में सबसे पहले सभी झूठे माबूदों से बेगानगी और उनका इनकार किया जाता है, उसके बाद अकेले और बेमिसाल अल्लाह की एकता को स्वीकार किया जाता है।

उन्होंने कहा कि जिस तरह अल्लाह को मानने के लिए झूठे माबूदों का इनकार आवश्यक है, उसी तरह सच्चे रसूल को मानने के लिए झूठे नबूवत के दावेदारों का इनकार करना होगा। इसी प्रकार वास्तविक मासूम इमामों को स्वीकार करने के लिए झूठे इमामों का इनकार भी आवश्यक है।

अहलेबैत के दुशमनो से बराअत

अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के दुश्मनों का उल्लेख करते हुए मौलाना सैयद अली हाशिम आबिदी ने कहा कि ये वे लोग थे जिन्होंने अल्लाह की अवज्ञा की, क़ुरआन में परिवर्तन किया, हलाल ए मुहम्मदी को हराम और हराम ए मुहम्मदी को हलाल घोषित किया।

उन्होंने कहा कि जिन लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि ने मदीना से बाहर किया था, उन्हें वापस बुलाया गया, जबकि अबूज़र जैसे सच्चे और सत्यवादी सहाबी को निर्वासित कर दिया गया। दुश्मनों ने पैग़म्बर के साथियों का अपमान किया, उन्हें शहीद किया, उन्हें यातनाएँ दीं और भूख-प्यास में रखा।

उन्होंने कहा कि दुश्मन चाहे अल्लाह का हो, रसूल का हो या अहलेबैत का  उससे बराअत और दूरी ज़रूरी है। यदि कोई अल्लाह को माने लेकिन रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि और मासूम इमामों को न माने, तो वह दुश्मन है और उससे बराअत आवश्यक है।

इसी तरह यदि कोई अल्लाह और रसूल को मानता हो, लेकिन अहलेबैत का इनकार करे और उनसे दुश्मनी रखे, तो उससे भी बराअत ज़रूरी है। इसी प्रकार यदि कोई अहलेबैत को मानता हो, उदाहरण के लिए अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम को स्वीकार करता हो, लेकिन अल्लाह और रसूल का इनकार करे, जैसे नुसैरी, तो वह भी उन लोगों में शामिल है जिनसे बराअत आवश्यक है।

तबर्रा मे मरजा ए तक़लीद के फ़तवो का पालन करें

मौलाना सैयद अली हाशिम आबिदी ने मोमिनों को संबोधित करते हुए कहा कि जिस तरह हम नमाज़, रोज़े और दूसरे शरीअती अहकाम में अपने मरजा ए तक़लीद के फ़तवो पर अमल करते हैं, उसी तरह तबरी के मामले में भी बड़े उलेमा और मराजे के फ़तवों को ध्यान में रखना चाहिए और उसी के अनुसार अमल करना चाहिए।

उन्होंने मरहूम आयतुल्लाहिल उज़्मा बहजत के इस फ़तवे का हवाला दिया कि यदि पूर्व में किसी व्यक्ति की तबरी के कारण पश्चिम में किसी मोमिन की हत्या हो जाए, तो वह व्यक्ति भी उसकी हत्या में शरीक माना जाएगा।

मौलाना ने कहा कि सऊदी अरब, संयक्त अरब अमीरात, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया और पाकिसातन के कुछ क्षेत्रओ मे शिया मोमिन दुशमनो के घेरे मे है। इसलिए इस मामले में विशेष सावधानी की आवश्यकता है। विशेष रूप से सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट साझा करने से बचना चाहिए, जिसके कारण दुनिया के किसी भी हिस्से में हमारे किसी धार्मिक भाई—यानी अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम के शिया या इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अज़ादार—को परेशानी या नुकसान का सामना करना पड़े।

यूवाओ को भावनाओ के बजाय समझदारी से काम लेना चाहिए

उन्होंने आगे कहा कि हमारे युवाओं को भावनाओ के बजाय समझदारी से काम लेना चाहिए, दुश्मन की साज़िशों को समझना चाहिए और सोशल मीडिया के इस्तेमाल में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि हम दुश्मन की किसी साज़िश का हिस्सा न बनें और हमारे किसी भावनात्मक कदम से किसी मोमिन या मोमिना को तकलीफ़ न पहुँचे।

कार्यक्रम के अंत में स्थानीय शायरों ने बारगाह ए अहलेबैत (अ) में काव्य के माध्यम से अपनी श्रद्धा और अक़ीदत पेश की।

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